हारना नहीं

हारना नहीं

 

रुको,

ठहरो,

यूं  बहो।

बात है क्या?

कुछ तो कहो

क्यों हो उदास,

ठगा गया विश्वास,

किंतु तुम तो थे खास

यूँ चुप रहो

क्या हुआ मित्र,

सफलता की इत्र,

धुंधला चित्र

इतनी शीघ्र  हो

जीवन का सार,

खुशी और प्यार,

जीत सम हा

गीता को हो।

कोशिश, प्रयत्, प्रयास,

साथ आत्मविश्वास,

उत्साह, साहस, आस

नाचो! उत्सव अहो!

चुप रहो,

कुछ तो कहो।।

तेरा ही आसरा है माँ …

तेरा ही आसरा है माँ, तू ही मेरा सहारा है।

हुआ दर्द दिल में जब भी माँ, तुझे ही तो पुकारा है।

अजब-सा दिन ये कैसा है, ग़जब ये रात ढाती है।

बड़ा भारी है पत्थर माँ, मेरी कमज़ोर छाती है।

नहीं कुछ भी लगे अच्छा, बस तेरा साथ प्यारा है।

तेरा ही आसरा है माँ, तू ही मेरा सहारा है।।

अभी मासूम बच्चा हूँ, समझ न मुझ को तू सयाना।

छोड़ मासूमियत को माँ, पड़ा बड़ा है बन जाना।

बड़ा भोला बड़ा नादाँ, माँ ये तेरा दुलारा है।

तेरा ही आसरा है माँ, तू ही मेरा सहारा है ।।

हवाएँ सर्द मौसम की, चुभे जैसे नग्न तन को।

वैसा ही हाल मेरा है, याद छलनी करे मन को।

मगर न प्रण को तोड़ेंगे, यही तो ‘प्रण’ हमारा है।

तेरा ही आसरा है माँ, तू ही मेरा सहारा है ।।

नहीं आँखों में आँसू की, कोई भी बूंद आएगी।

धूल दुनिया की ना कोई, आँखों को मूंद पाएगी।

चित्र ना गंदा होगा वो, जो आँखों में उतारा है।

तेरा ही आसरा है माँ, तू ही मेरा सहारा है ।।

मेरा मन तेरे चरणों में रहे मुझ को यही वर दे।

जहाँ पर वास हो तेरा, माँ मुझ को तो वही घर दे।

मेरी नज़रों में मेरी माँ, बस तेरा ही नज़ारा है।

मेरा जीवन भी सँवरे माँ, तूने सबका सँवारा है।

तेरा ही आसरा है माँ, तू ही मेरा सहारा है ।।

तेरा ही आसरा है माँ, तू ही मेरा सहारा है।।

माँ चालीसा – 1

एक प्रयास भर है माँ की महिमा गाने का।

श्रवण न सही… श्रवण- सा बन जाने का ।।

जय माता ममता का सागर।

छलके तेरे प्रेम की गागर।।

दया से तेरी दया भी हारी।

प्रकृति तेरी सदा उपकारी।।

धरा की तरह धरा क्षमा है।

तू ही माँ त्रिदेव की माँ है।।

मास नौ भार पेट में ढ़ोती।

संग तेरे कभी हँसती-रोती।।

दुख-तकलीफ सही सब हँसकर।

जन्म दिया है स्वयं पिघलकर।।

फिर तेरे मल से निर्मल हो।

साथ तेरे बच्चा हर पल हो।।

खुद को भूल गई महामाई।

चैन-नींद की चिता जलाई।।

होम से खुश होते देवता।

तुझपर सदा प्रसन्न है ये माँ।।

होमवर्क तेरा या माँ का।

माँ है फिर क्यों बाल हो बाँका।।

काश इतना योग्य हो जाऊँ।

तेरी महिमा मैं गा पाऊँ।।

सबसे बड़ा मंत्र है ‘माँ’ ही।

भजने में ना करो कोताही।।

ब्रह्मा-विष्णु-महेश ने गाई।

महिमा नहीं गई बताई।।

दर्द तुझे जब भी हैं सताते।

आँसू माँ के नेत्र से आते।।

हार गया तू जब भी कभी।

ढ़ाँढ़स तुझे, रोई अंदर ही।।

शादी में तेरी माँ नाची।

खुशियों की सब पोथी बाँची।।

नया दौर जीवन का आया।

माँ ने अपना फर्ज निभाया।।

जब भर जाता आँखों तक हूँ

जब भर जाता आंखों तक हूँ,

जब छल-छल छलका करता हूँ,

जब जीवन-मृत्यु बीच झूलता,

जीता हूं, ना मरता हूँ,

तब स्रष्टा को सम्मुख पाता हूँ।

तब इक नया छंद बनाता हूँ।

जब उड़ता-फिरता बिना बंध,

ज्यों फिरता ये मन हो स्वच्छंद,

निज होने को जाता मैं भूल,

जब जीवन लगता मात्र धूल,

तब मुक्त-कंठ मैं गाता हूँ।

तब इक नया छंद बनाता हूँ।

जब सोचूँ, क्यों मैं जीता हूँ?

प्याले अपमान के पीता हूँ,

जब दिल-दिमाग का मेल ना हो,

जीऊँ या मरूँ, अब तुम ही कहो,

अभागे अश्रु व्यर्थ बहाता हूँ।

तब इक नया छंद बनाता हूँ।।

तब स्रष्टा को सम्मुख पाता हूँ।

तब इक नया छंद बनाता हूँ।

ए ख़ुशी

ए खुशी गुम गई तू बता दे कहाँ

अपनी पलकें बिछाये मैं खड़ा हूं यहाँ।

की प्रतीक्षा तेरी, की समीक्षा मेरी,

अज्ञान था राह में, थी अशिक्षा मेरी।

राह बतला दे मुझको, मैं पाऊं जहाँ 

ए खुशी गुम गई तू बता दे कहाँ ?

बादलों में था ढूंढा, पागलों की तरह

ख्वाबों में भी था देखा, मनचलों की तरह।

पाने को बस तुझे, दर्द सारा सहा 

ए खुशी गुम गई तू बता दे कहाँ ?

दोस्तों दोस्ती पर भी कुर्बान था

चालाकी, मतलबी से भी अनजान था।

लुट गया मैं तो सारा, फिर भी कुछ ना लहा 

ए खुशी गुम गई तू बता दे कहाँ ?

स्वाद में तू नहीं, याद में तू नहीं 

मौन में तू नहीं, बात में तू नहीं।

तू मिली बस मुझे, मन बना जब महा 

ए खुशी गुम गई तू बता दे कहाँ ?

शब्द कुछ भी कहें, दर्द कुछ भी सहे

सांस थमी हो कभी, नेत्र बहता रहे।

दिल बड़ा रख लो तुम, फिर खुशी है वहाँ

ए खुशी गुम गई तू बता दे कहाँ ?

ए खुशी मिल गई तू मुझे अब यहाँ

ए खुशी मिल गई तू मुझे अब यहाँ।

काश कि जैसा सोचा मैंने …

काश कि जैसा सोचा मैंने,

वैसा ही सब कुछ होता।

आँखें ना नम होती मेरी,

और ना मेरा दिल रोता।

काश कि जैसा सोचा मैंने, 

वैसा ही सब कुछ होता।

काश कि जैसा सोचा मैंने, 

वैसा ही सब कुछ होता।

सोचा था कि सुमन खिलेंगे,

चमन मेरा भी महकेगा।

झाँक हृदय में देखे कोई,

भावुकता को समझेगा।

किंतु वही तो हुआ नहीं,

जिसकी जीवन भर चाह रही।

कानों के लिए जो अमृत हो,

किसी ने ना ऐसी बात कही।

मत सोच चकोर ये बात कभी, 

कि तड़पा तू ही इकलौता।

काश कि जैसा सोचा मैंने, 

वैसा ही सब कुछ होता।

ये दिखी रोशनी, हुआ सवेरा,

किंतु ये तो था बस भ्रम मेरा।

जीत लेता मैं ये जग सारा,

संग जो मिल जाता दम तेरा।

अभी यद्यपि देर ना हुई,

इंतजार अभी शेष रहा।

मिला नहीं, पहले बिछड़ा वो,

जीवन भर ये क्लेश रहा।

ओ हृदय मेरे अब मान भी जा, 

जो कुछ पाता है, वो खोता।

काश कि जैसा सोचा मैंने, 

वैसा ही सब कुछ होता।

काश कि जैसा सोचा मैंने, 

वैसा ही सब कुछ होता।

अग्नि-परीक्षा

माँ यदि मैं होता वहाँ,

तो मेरे जीते जी,

किसी की ना होती हिम्मत,

जो

पूछ भी लेता

तुझसे अग्नि-परीक्षा के बारे में।

‘मेरी माँ पर संदेह’

या तो मेरे सिर पर भी

होता सिर गयंद का,

बन जाता मैं भी

एकदंत गजानन।

या फिर वहाँ ढेर होता

रक्त और मृत शरीरों का।

फ़र्क क्या पड़ता है

कि

सामने कौन है ?

कोई दैत्य है ?

दानव है ?

मानव है ?

या स्वयं भगवान ।

अन्याय करने वाला

हर जीव पापी है।

मैं जानता हूंँ ‘माँ’

तेरी पीड़ा…

बार-बार अग्नि-परीक्षा

का दंश।

मुझसे सहा नहीं जाता,

यूँ राम बनकर होने देना अन्याय।

मैं भीष्म नहीं,

जो अपने ही सामने

अपने ही घर की इज़्ज़त,

संसार की शोभा..स्त्री,

को होने दे अपमानित।

मैं सह नहीं सकता था ‘माँ’।

माँ तेरी सहनशक्ति

अद्भुत थी।

कितना सहा तूने,

तूने तो स्त्री को

उस उच्च शिखर पर

बैठा दिया कि

अब वह स्वयं

चाहे भी तो

गिर नहीं सकती।

सदा-सर्वदा के लिए

सम्मानित हो गई है वो।

‘माँ’ जानकी

मुझे रुला ही देती है,

बात तेरे अपमान की।

आखिर क्यों नहीं किया

तूने विरोध

अग्नि-परीक्षा का ?

क्यों तू सब सहती रही ?

क्यों मानी राम ने भी

एक मूढ़ प्राणी की बात ?

क्यों ना दिखी उन्हें

पवित्र वैदेही ?

क्यों किया ये अधर्म ?

पर मेरे राम की भी

विवशता रही होगी मात,

किंतु तेरा पुत्र विवश नहीं है।

यह कफ़न के साथ ही

पैदा हुआ है।

यूँ किसी भी स्त्री की

अस्मिता से

कोई-भी

कभी-भी

ना कर सकेगा खिलवाड़,

जब तक ज़िंदा है

तेरा सुपुत्र ‘माँ’।

माँ आशीर्वाद।

वास्तविक लक्ष्य

मैं चल पड़ा,

चलते हुए सोच रहा था,

लक्ष्य शीघ्र पा लूँगा,

आराम से, खुशी से, बिना कष्ट।

चल पड़ा..

पर ये क्या?

एक गड्ढा मेरे पथ में,

बड़ा धक्का लगा,

अब क्या करूँ?

इधर-उधर देखा,

ताकि अन्य रास्ता दिख जाए,

या कोई सहारा ही मिल जाए,

फिर सोचा, चलो लक्ष्य ही बदलते हैं।

किंतु बदल न सका,

कहीं उसमें भी गड्डा आ गया तो,

मैं डर गया।

हारकर उतर गया गड्ढे में,

पसीना बहा, परेशान हो,

बड़ी कठिनाई से निकल सका।

पर अब मैं खुश था,

क्योंकि आगे लक्ष्य था

और गड्ढे को तो मैंने पीछे ही छोड़ दिया था।

पर यह क्या?

एक और बड़ा गड्ढा,

उससे बड़ा,

पर मुझे बहुत बड़ा लगा।

मैं बहुत चिंतित हुआ,

दुखी भी।

अब क्या करूंँ?

हे भगवान !

अब कैसे लक्ष्य पाऊंँगा?

ऐसे तो मैं मर जाऊंँगा।

भूला लक्ष्य, बस शोक (और वास्तव में ऐसे कभी लक्ष्य नहीं मिलते)

थक हारकर, भाग्य को कोसकर,

उतरा गड्ढे में,

पसीना बहाया, परेशान हुआ और पार हो गया।

मैं खुश था, थोड़ा दुख भी

यह गड्ढे नहीं होते तो मैं आज कहांँ होता?

फिर से चल पड़ा लक्ष्य के और निकट ।

पर यह क्या?

सामने खाई ।

मेरी आंँख भर आई।

भगवान और भाग्य को लगा कोसने,

डर गया, हार गया, लगा मुझे ।

रोया, बिलखा,

ऐसा मेरे साथ ही क्यों होता है?

निराशा तैयार थी,

अवसाद पास आ गया,

तनाव ने जाल फैलाया,

बैठा रहा और सोचा, मुझे लक्ष्य न मिलेगा ।

मिलना लिखा होता, तो ऐसा क्यों होता?

बैठा रहा, हाथ पर हाथ धरे।

फिर सोचा,

बैठने से अच्छा चलना है ।

अब खाई में उतरना है।

उतर गया,

इस बार पसीना ही नहीं,

खून भी बहा था,

बड़ा कष्ट सहा था,

लगा था पार न आ पाऊंँगा,

शायद मर जाऊंँगा।

‘पर मौत से पहले नहीं’ किसी ने कहा।

मैं लगा रहा,

पार आ गया,

अधमरा था।

थोड़ी खुशी थी, थोड़ी थी।

क्योंकि डर रहा था,

क्या लक्ष्य मिलेगा?

लक्ष्य सामने ही था।

पर डर भी।

आगे क्या होगा?

इसी तरह कभी गड्ढे, कभी नाली,

कभी खाई, कभी बाढ़, कभी पर्वत, कभी सागर,

कभी तूफान आते गए ।

मैं डरता गया, लड़ता गया,

गिरता गया, संभलता गया।

मेरे पास एक शक्ति थी।(सब के पास होती है)

अब तो मुझे इन गड्ढों की आदत हो गई थी ।

तभी एक बड़ा भयानक डरावना जो गड्ढा भी था,

खाई भी, जो घाटी भी था, पहाड़ भी,

जो तूफान भी था, महासागर भी,

आया।

मैं कई बार मरते-मरते बचा,

कई बार तो लगा कि सिर्फ आत्मा है, शरीर नहीं,

कहीं मर तो नहीं गया मैं।

लक्ष्य मुझे अभी भी याद था।

अब डर नहीं था।

या तो जीतना-जीना है,

और या सिर्फ जीतना-जीना ही है ।

बच गया।

पार कर गया,( बहुत कम कर पाते हैं)

लक्ष्य सामने ही था ।

वहांँ खड़े एक सजीले युवक से मैंने पूछा,

“यह कौन-सा देश है?”

“यहांँ सब सुख सुविधाएँ हैं, यहाँ आने के बाद,

अब तुम्हें और गड्ढे नहीं मिलेंगे।

यही तुम्हारा लक्ष्य है, तुम भाग्यशाली हो,

यह स्वर्ग है” उसने बताया।

मैं खड़ा रहा कुछ देर,

वापस मुड़ गया,

और उन्हीं खाई, गड्ढों में जाने लगा।

उसने टोका, “उधर तो गड्ढे हैं, संघर्ष है, इधर आराम है,

इधर आओ, यही सबका लक्ष्य है।”

” नहीं।” मैंने कहा। “मुझे मेरा लक्ष्य मिल गया।

यही संघर्ष मेरा लक्ष्य है, मुझे इन गड्ढों से प्यार है ।

मैं इसी रास्ते आऊंँगा और जाऊंँगा। मुझे मिल गया मेरा लक्ष्य।”

“पागल है।” कहकर वह चला गया।

मैं उसी रास्ते, उन्हीं गड्ढों से आता-जाता, जाता-आता,

अब मुझे उतना कष्ट नहीं होता था,

रास्ते भी कुछ आसान हो गए,

और रास्ते बनते चले गए।

जिन गड्डों से लोग बचते थे,

अब बच्चे भी उस रास्ते आराम से आते-जाते।

धीरे-धीरे वही रास्ता आम रास्ता हो गया।

अब गड्ढे भर चुके थे – पसीने से, साहस से, श्रम से,

और मुझे मेरा वास्तविक लक्ष्य मिल गया।।।

—घनश्याम शर्मा

शाम अकेला कर देती है

शाम अकेला कर देती है

नया झमेला कर देती है

तनहाई की बारिश करती

खाली मेला कर देती है

शाम अकेला कर देती है।

मन चंचल भी हो जाता है

दिल निश्चल भी हो जाता है

कुछ भी मुझको समझ न आता

पागल हर पल हो जाता है

पास खुशी की लहरें लाता

दूर ये रेला कर देती है

शाम अकेला कर देती है

आंसू आते उमड़-घुमड़ कर

ज्यों जलधर आते उड़ उड़कर

याद अतीत फिर मुझको आता

किन्तु न देखूँ मैं मुड़ मुड़कर

अनमोल बहुत है शाम नजारा

पर ये धेला कर देती है

शाम अकेला कर देती है

अंदर ही घर के रहता हूं

शाम से यारों मैं डरता हूं

मुझसे शाम का जिक्र न करो

सब से यह मैं तो कहता हूं

मेरे खुशी के सब लम्हों को

दुख की बेला कर देती है

शाम अकेला कर देती है

शाम अकेला कर देती है

तनहाई की बारिश करती

खाली मेला कर देती है

शाम अकेला कर देती है।

शाम अकेला कर देती है।।

—घनश्याम शर्मा

याद

याद

मैं अपनी मम्मी को याद नहीं करता
और
पापा को भी नहीं
बहनों को तो बिल्कुल नहीं
और भाई-भाभी बच्चों को भी नहीं

नहीं मैं याद नहीं करता
किसी भी उस व्यक्ति को
जिससे मेरा घनिष्ठ से भी घनिष्ठ सम्बंध है

कहते हैं
जिसको आप
अत्यंत भाव विभोर होकर
करते हैं याद

फिर वो भी
आपको वैसे ही
करता है याद

और

उसका मन भी
आपकी ही तरह
छटपटाता है

अब क्या आप चाहेंगे कि
आपकी माँ
आपके पिताजी
आपकी बहनें
आपके भाई
आपके बच्चे
आपके घनिष्ठ
तड़पें
छटपटाएँ
आँसू बहाएँ
आपकी तरह

नहीं ना
बिल्कुल नहीं

फिर बोलो
मैं क्या ग़लत करता हूँ ? —घनश्याम शर्मा