जीवन, संग्राम ही तो है
जीवन, संग्राम ही तो है।
जो हमने भुगता, जो हमने पाया,
जो आज हमारे पास है ,
वो कल का अंजाम ही तो है।
जीवन, संग्राम ही तो है ।
जीवन, संग्राम ही तो है ।।
आज की मेहनत, आज की लगन,
आज की आशा कल फलीभूत होगी,
कुछ अच्छी बन कर,
ये भी अनुमान ही तो है।
जीवन, संग्राम ही तो है ।
जीवन, संग्राम ही तो है ।।
कुछ खट्टा, कुछ मीठा,
दर्द-गम, खुशियों में बीत रहा,
निरंतर उत्साहित करता,
ऐसा वर्तमान ही तो है ।
जीवन, संग्राम ही तो है।
जीवन, संग्राम ही तो है ।।
लाख कोशिशें, हज़ारों असफलताएं,
‘हूंगा कामयाब’ इसी उम्मीद में
एक और कोशिश करता,
मानव, नादान ही तो है।
जीवन, संग्राम ही तो है ।
जीवन, संग्राम ही तो है ।।
जब आया हूं तो संघर्ष करूंगा,
मनुष्य मुकाबला कर,
लगातार परिस्थितियों से लड़,
कभी हार ना मानना,
तेरी पहचान ही तो है।
कभी हार ना मानना तेरी पहचान ही तो है।
जीवन, संग्राम ही तो है ।
जीवन, संग्राम ही तो है ।
जीवन संग्राम ही तो है।।
– घनश्याम Sharma
मैं राम हूँ
मैं राम हूँ
हाँ मैं राम हूँ।
सीता का राम
कौशल्या का राम
दशरथ का राम
शबरी का राम
हनुमान का राम
आपका अपना
मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम
हाँ भगवान हूँ।
सबल हूँ।
सक्षम हूँ।
योग्य हूँ।
कुशल हूँ।
फिर भी मेरा जीवन…
मेरी पत्नी
मेरा भाई
और स्वयं मुझे
पड़ा छोड़ना घर
हुए बेघर
जंगल ही बसेरा
जानवरों में डेरा।
शत्रु बना संसार
असुर हज़ार।
चोरी होती होंगी तुम्हारी तो बस वस्तुएँ
मेरी तो पत्नी…
और हाँ मैं भगवान हूँ।
मेरे साथ ऐसा क्यों ?
था आधिग्रस्त मैं भी।
क्या थी मेरी गलती ?
ईमानदारी
सदाचार
सत्य-व्यवहार
वचन-पालन
पितृ-प्रेम…
फिर भी क्यों ?…
… और सत्य-संग्राम में
विरुद्ध दैत्यों के
समझदार प्राणी मनुष्य तो साथ ही न था मेरे
… सरल हृदय भालू-वानर बस साथ।
इतने पर भी विधि को संतोष कहाँ ?
पत्नी की परीक्षा…
अग्नि-परीक्षा।
किसे दे पाया मैं सुख ?
न पिता को
न माता को
न भाई को
न पत्नी को
हाँ प्रजा को मिला ‘राम-राज्य’
किंतु
फिर दोषारोपण वहीं से।
मुझ पर भी उठी उंगली…
जब थी ज़रूरत मेरी जानकी को
तब मैं था ही नहीं उसके पास।
बच्चे भी हुए जंगल में
गोद तक में ले न पाया शिशु को।
और याद दिला दूँ…
मैं भगवान हूँ..
मै राम हूँ।
जब मेरे साथ इतना कुछ..
तो तुम तो मानव हो…
और यही जीवन है।
हर समय
तैयार खड़ी है
एक नई चुनौती..
करो स्वीकार
तुम भी रहो तैयार
मत मानो हार
भले ही तुम कर्मराही हो
परंतु
विपरीत परिणाम भी होंगे मेरे यार
चरैवेति-चरैवेति
यही जीवन-सार।
— घनश्याम शर्मा
गीतों की बस्ती का शहज़ादा
*गीतों की बस्ती का शहज़ादा…*
मैं गीतों की बस्ती का शहज़ादा, मैं राजकुमार। -2
मैं गीत बनाता, गीत ही गाता और मैं करता प्यार।
मैं गीतों की…
मेरी बांहों में संगीतों के सागर हैं लहराते। -2
पास मेरे सुख-दुख जब आते, गीत *खुशी* के ही गाते।
दर्दों में भी चीर निकालूं…
दर्दों में भी चीर निकालूं, खुशी की मैं झंकार।।
मैं गीतों की बस्ती का शहज़ादा, मैं राजकुमार।।
दुख-तकलीफें हो या हों जीवन में तेरे अंधियारा। -2
पास मेरे आ जा प्यारे, तू छोड़ के सब मेरे यारा।
तेरे हर कष्टों का यारा…
तेरे हर कष्टों का यारा, कर दूंगा संहार ।।
मैं गीतों की बस्ती का शहज़ादा, मैं राजकुमार।।
*सोचो जीने आए हो या आए हो तुम मरने। -2*
*आए थे कुछ करने और तुम लगे हो कुछ ही करने।*
हंसी-खुशी और प्यार मोहब्बत…
*हंसी-खुशी और प्यार मोहब्बत, है ये जीवन सार।।*
मैं गीतों की बस्ती का शहज़ादा, मैं राजकुमार।।
मैं गीत बनाता, गीत ही गाता और मैं करता प्यार।।
मैं गीतों की बस्ती का शहज़ादा, मैं राजकुमार।।
हूँ… हूँ.. हूँ…
— *घनश्याम शर्मा
विजय का नया पंथ
विजय का नया पंथ ले
न हार है, न जीत है,
न बैर है, न प्रीत है।
निपट एकांत चल रहा,
सखा न कोई मीत है।
मनुष्य मान ले यदि,
कि हारना मुझे नहीं।
जो बढ़ चुके मेरे कदम,
रुकेंगे अब कभी नहीं।
फ़िर कौन है जो रोक ले,
हे धीर तेरी राह को ।
विजय प्रतीक्षा कर रही,
पसार अपनी बाँह को।
हताशा-हार छोड़ दे,
निराशा-नाता तोड़ दे।
विजेता बन, उभर मनुज,
दु:स्वप्न सारे तोड़ दे।
विश्वास की कलम ले थाम,
दृढ़ता का ग्रंथ ले,
छोड़ राह हार की,
विजय का नया पंथ ले।।
विजय का नया पंथ ले।।।
विजय का नया पंथ ले।।।।
–घनश्याम शर्मा
विजय का नया पंथ
हंसी बांटता हूँ
हंसी बांटता हूँ,
खुशी बांटता हूँ।
ये दौलत तो मैं
हर घड़ी बांटता हूँ।
मिले गम मुझे तो
लगे वो भी हंसने,
खुशी की नयी
फुलझड़ी बांटता हूँ।।
जब आपको लगता है कि आप हार रहे हैं या हार चुके हैं, दरअसल वो आपकी जीत की पूर्व सूचना होती है। और जब आपको लगता है कि आप जीत चुके हैं या जीत रहे हैं, दरअसल ये भ्रम है, वास्तव में ऐसा कुछ नहीं होता। भगवान राम अयोध्या से सबकुछ हारकर वनवास गये; ये जीत थी उनकी। रावण पर विजय पायी, माता सीता को घर लाये, अग्नि परीक्षा ली; हार थी उनकी। क्या मिला उन्हें?? भगवान श्रीकृष्ण जेल में पैदा हुए, जन्म देने वाली माँ का प्यार भी न मिला, किंतु ये हार उनकी सबसे बड़ी जीत थी। …और महाभारत के महायुद्ध की थोथी महाजीत को क्या जीत कहा जा सकता है?? दरअसल इस युद्ध में सब लोग हारे थे, लड़ने वाले भी, न लड़ने वाले भी।। … और सबसे ज़्यादा हारे थे.. जीतने वाले।। तो जीत है क्या❓ “प्रसन्नता ही विजय है और खुश रहना आप चुन सकते हैं। Happiness is a Choice. “
— घनश्याम शर्मा
कुछ करने की हिम्मत
कुछ करने की हिम्मत है तो,
सपने रख तू बड़े-बड़े।
दौड़ भाग कर मिलती मंजिल,
सोच रहा क्या खड़े-खड़े।
आसमान पर जोश को रखदे,
होश ज़मीं पर भी रखना।
स्वाद सफलता के तू अपने,
धीरे-धीरे ही चखना।
देख दुखों को मत डरना,
दर्दों से दोस्ती करनी है।
जिनके सपने चूर हो गए,
वहाँ रोशनी भरनी है।
अंगारों की राह भले,
नंगे पांवों को डर कैसा ?
बाधाओं को देखके लटके,
नहीं चाहिए सिर ऐसा।
यदि भयंकर भार भीत का,
तो भी मां साहस भर दे।
नहीं मानूँ मैं हार कभी,
अपने बेटे को ये वर दे।
नहीं मानूँ मैं हार कभी,
अपने बेटे को ये वर दे।
–घनश्याम शर्मा
मंगलाचरण
प्रथम मेरा ये काम है , हे गणपति महाराज ।
इसको भी पूर्ण करें , जैसे किए सब काज ।
आज साज शब्दों का लेकर , बेटा आया “माँ “,
आशीर्वाद बस यही मिले , गुरु -मात-पिता करें नाज़ ।।
—घनश्याम शर्मा
माँ शारदा- प्रार्थना
दो सुमन समर्पित करता हूँ
दो सुमन समर्पित करता हूँ, अपना मन अर्पित करता हूँ।
मां सरस्वती चरणों में तेरे , यह जीवन अर्पित करता हूँ।
तेरी कृपा से ज्ञान-देवी, मूर्ख भी ज्ञानी बनता है।
दया-दृष्टि पड़े जिस पर,सब की हैरानी बनता है।
तेरी भक्ति के बीज मैया, मैं खुद में विकसित करता हूँ।
दो सुमन समर्पित करता हूंँ, अपना मन अर्पित करता हूँ।।
अब तक जीया हूँ मैया,मैं जग की ठोकर खा-खाकर।
बिन ज्ञान, नहीं सम्मान मिला, मैं देख चुका दर जा-जाकर।
अंत शरण में तेरी मैया, मैं स्वयं को शरणित करता हूँ।
दो सुमन समर्पित करता हूँ, अपना मन अर्पित करता हूँ।
है ज्ञान-सूर्य अंबा मेरी,मुझमें ज्ञान-दीप जला दो तुम।
अंधकार जितना मुझ में,उसको तो दूर भगा दो तुम।
मन की बात बता तुझको, मैं मन को हर्षित करता हूँ।
दो सुमन समर्पित करता हूँ, अपना मन अर्पित करता हूँ।
मां सरस्वती चरणों में तेरे, यह जीवन अर्पित करता हूँ।।
यह जीवन अर्पित करता हूँ।।।।
- घनश्याम शर्मा
The Journey Begins
Thanks for joining me!
Good company in a journey makes the way seem shorter. — Izaak Walton

