वास्तविक लक्ष्य

मैं चल पड़ा,

चलते हुए सोच रहा था,

लक्ष्य शीघ्र पा लूँगा,

आराम से, खुशी से, बिना कष्ट।

चल पड़ा..

पर ये क्या?

एक गड्ढा मेरे पथ में,

बड़ा धक्का लगा,

अब क्या करूँ?

इधर-उधर देखा,

ताकि अन्य रास्ता दिख जाए,

या कोई सहारा ही मिल जाए,

फिर सोचा, चलो लक्ष्य ही बदलते हैं।

किंतु बदल न सका,

कहीं उसमें भी गड्डा आ गया तो,

मैं डर गया।

हारकर उतर गया गड्ढे में,

पसीना बहा, परेशान हो,

बड़ी कठिनाई से निकल सका।

पर अब मैं खुश था,

क्योंकि आगे लक्ष्य था

और गड्ढे को तो मैंने पीछे ही छोड़ दिया था।

पर यह क्या?

एक और बड़ा गड्ढा,

उससे बड़ा,

पर मुझे बहुत बड़ा लगा।

मैं बहुत चिंतित हुआ,

दुखी भी।

अब क्या करूंँ?

हे भगवान !

अब कैसे लक्ष्य पाऊंँगा?

ऐसे तो मैं मर जाऊंँगा।

भूला लक्ष्य, बस शोक (और वास्तव में ऐसे कभी लक्ष्य नहीं मिलते)

थक हारकर, भाग्य को कोसकर,

उतरा गड्ढे में,

पसीना बहाया, परेशान हुआ और पार हो गया।

मैं खुश था, थोड़ा दुख भी

यह गड्ढे नहीं होते तो मैं आज कहांँ होता?

फिर से चल पड़ा लक्ष्य के और निकट ।

पर यह क्या?

सामने खाई ।

मेरी आंँख भर आई।

भगवान और भाग्य को लगा कोसने,

डर गया, हार गया, लगा मुझे ।

रोया, बिलखा,

ऐसा मेरे साथ ही क्यों होता है?

निराशा तैयार थी,

अवसाद पास आ गया,

तनाव ने जाल फैलाया,

बैठा रहा और सोचा, मुझे लक्ष्य न मिलेगा ।

मिलना लिखा होता, तो ऐसा क्यों होता?

बैठा रहा, हाथ पर हाथ धरे।

फिर सोचा,

बैठने से अच्छा चलना है ।

अब खाई में उतरना है।

उतर गया,

इस बार पसीना ही नहीं,

खून भी बहा था,

बड़ा कष्ट सहा था,

लगा था पार न आ पाऊंँगा,

शायद मर जाऊंँगा।

‘पर मौत से पहले नहीं’ किसी ने कहा।

मैं लगा रहा,

पार आ गया,

अधमरा था।

थोड़ी खुशी थी, थोड़ी थी।

क्योंकि डर रहा था,

क्या लक्ष्य मिलेगा?

लक्ष्य सामने ही था।

पर डर भी।

आगे क्या होगा?

इसी तरह कभी गड्ढे, कभी नाली,

कभी खाई, कभी बाढ़, कभी पर्वत, कभी सागर,

कभी तूफान आते गए ।

मैं डरता गया, लड़ता गया,

गिरता गया, संभलता गया।

मेरे पास एक शक्ति थी।(सब के पास होती है)

अब तो मुझे इन गड्ढों की आदत हो गई थी ।

तभी एक बड़ा भयानक डरावना जो गड्ढा भी था,

खाई भी, जो घाटी भी था, पहाड़ भी,

जो तूफान भी था, महासागर भी,

आया।

मैं कई बार मरते-मरते बचा,

कई बार तो लगा कि सिर्फ आत्मा है, शरीर नहीं,

कहीं मर तो नहीं गया मैं।

लक्ष्य मुझे अभी भी याद था।

अब डर नहीं था।

या तो जीतना-जीना है,

और या सिर्फ जीतना-जीना ही है ।

बच गया।

पार कर गया,( बहुत कम कर पाते हैं)

लक्ष्य सामने ही था ।

वहांँ खड़े एक सजीले युवक से मैंने पूछा,

“यह कौन-सा देश है?”

“यहांँ सब सुख सुविधाएँ हैं, यहाँ आने के बाद,

अब तुम्हें और गड्ढे नहीं मिलेंगे।

यही तुम्हारा लक्ष्य है, तुम भाग्यशाली हो,

यह स्वर्ग है” उसने बताया।

मैं खड़ा रहा कुछ देर,

वापस मुड़ गया,

और उन्हीं खाई, गड्ढों में जाने लगा।

उसने टोका, “उधर तो गड्ढे हैं, संघर्ष है, इधर आराम है,

इधर आओ, यही सबका लक्ष्य है।”

” नहीं।” मैंने कहा। “मुझे मेरा लक्ष्य मिल गया।

यही संघर्ष मेरा लक्ष्य है, मुझे इन गड्ढों से प्यार है ।

मैं इसी रास्ते आऊंँगा और जाऊंँगा। मुझे मिल गया मेरा लक्ष्य।”

“पागल है।” कहकर वह चला गया।

मैं उसी रास्ते, उन्हीं गड्ढों से आता-जाता, जाता-आता,

अब मुझे उतना कष्ट नहीं होता था,

रास्ते भी कुछ आसान हो गए,

और रास्ते बनते चले गए।

जिन गड्डों से लोग बचते थे,

अब बच्चे भी उस रास्ते आराम से आते-जाते।

धीरे-धीरे वही रास्ता आम रास्ता हो गया।

अब गड्ढे भर चुके थे – पसीने से, साहस से, श्रम से,

और मुझे मेरा वास्तविक लक्ष्य मिल गया।।।

—घनश्याम शर्मा

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